पंजाब में इस बार 48 सीटों पर मुकाबला जबरदस्त

पंजाब में इस बार 48 सीटों पर मुकाबला जबरदस्त

दोआबा में दलित, माझा में पंथक वोट तय करेगी किसके पास होगी सत्ता की चाबी

कपूरथला/चंद्रशेखर कालिया: पंजाब में इस बार 48 सीटों पर मुकाबला जबरदस्त होने के आसार हैं। दलित वोट के लिए अकाली दल बसपा तो कांग्रेस सीएम चरणजीत चन्नी के सहारे बैठी है। पंजाब विधानसभा चुनाव का समर शुरू हो चुका है। दोआबा व माझा में इस बार दलित व पंथक वोट तय करेगा कि सत्ता की चाबी किसके हाथ देनी है। लिहाजा तमाम राजनीतिक पार्टियों में दलित व पंथक वोट को लेकर घमासान मचा हुआ है। 2017 के मुकाबले इस बार चुनाव बिलकुल अलग होने जा रहे हैं। इस बार मुकाबला पांच कोणीय है हालांकि अभी तक संयुक्त समाज मोर्चा की उपस्थिति दर्ज नहीं हुई है। लेकिन अगर संयुक्त समाज मोर्चा मैदान में दमखम से उतरता है तो मुकाबला पांच कोणीय हो सकता है। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 38.5 फीसदी मत मिले थे और माझा से 25 में से 22 सीटें कांग्रेस की झोली में आई थीं कारण साफ था कि बेअदबी की घटनाओं से पंथक वोट अकाली दल से खासे नाराज थे। खेमकरण से लेकर पट्टी, राजासांसी से लेकर बटाला, तरनतारन, खडूर साहिब में बहुसंख्यक पंथक वोट हैं, जो अकाली दल से काफी दूर हो गए थे और पंथक नेता लगातार अकाली दल पर तीखे हमले कर रहे थे। हालात यह थे कि अकाली दल को महज 2 सीटों पर ही गुजारा करना पड़ा। आम आदमी पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई।इस बार अकाली दल पंथक वोट की वापसी के लिए काफी संघर्ष कर चुका है और हाल ही में बेअदबी की घटनाओं को लेकर रोष दिवस भी मनाया गया है। नाराज पंथक नेताओं को मनाने के साथ ही ब्रह्मपुरा, अजनाला परिवार की अकाली दल में वापसी हो गई है। अकाली दल को इस बार अपना वोट बैंक वापस आने की उम्मीद है।आम आदमी पार्टी ने भी कम दांव नहीं खेला है। अमृतसर से कुंवर विजय प्रताप को मैदान में उतारा है। कुंवर विजय प्रताप बेअदबी की घटनाओं की जांच करने वाले अधिकारी थे और उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। कुंवर विजय प्रताप को माझा से लड़ाया जा रहा है, इसलिए आप को भी पूरी उम्मीद है कि पंथक वोट बैंक उनकी तरफ आ जाएगा। वहीं कांग्रेस ने अपने दोनों डिप्टी सीएम माझा इलाके से दिए हैं। सुखजिंदर रंधावा व ओपी सोनी दोनों माझा से हैं। इसलिए कांग्रेस अपनी पूरी ताकत माझा में झोंक रही है। पीपीसीसी प्रधान नवजोत सिंह सिद्धू भी माझा से हैं। कांग्रेस ने मजीठिया पर केस दर्ज कर माझा के जरनैल कहे जाते बिक्रम मजीठिया को बैकफुट पर कर दिया है, जिससे कांग्रेस को माझा में अपना वोट बढ़ने की उम्मीद है। भाजपा भी माझा में अपने पैर पसार रही है। पीएम मोदी लगातार सिख समुदाय से भावनात्मक व धार्मिक रूप से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। माझा से विधायक फतेहजंग बाजवा को अपना हिस्सा बना लिया है। भाजपा करतारपुर कॉरिडोर को खोलना, सिखों की काली सूची को खत्म करने का मुद्दा भी जनता के बीच ले जा रही है ताकि सिख व पंथक वोट को अपनी तरफ लिया जा सके। अभी संयुक्त समाज मोर्चा की तरफ से मैदान में मजबूती से उतरकर दांव नहीं खेला जा रहा है। अगर माझा के किसान एकजुट हो जाते हैं तो इससे अकाली दल, कांग्रेस व आप को झटका लगना तय है।

दोआबा में 23 में से 15 सीटें कांग्रेस ने जीती थीं
दोआबा में 42 फीसदी वोट दलितों के हैं। 23 विधानसभा सीटों में से पिछली बार 15 सीटें कांग्रेस के खाते में आई थीं जबकि अकाली दल 5 सीटें व आप दो व भाजपा के हिस्से एक सीट आई थी। दोआबा में अकाली दल के तीन विधायक दलित हैं, जो पिछली बार दोआबा में जीते थे। इस बार अकाली दल ने बसपा का सहारा लिया है और उनके लिए 20 विधानसभा सीटें छोड़ी हैं। सुखबीर बादल ने सूबे में डिप्टी सीएम की कुर्सी भी दलित को देने का वादा कर रखा है। अकाली दल का दलितों की सीटों पर मजबूत वोट बैंक है। कांग्रेस अपना घर बचाने के लिए पूरी ताकत झोंकने की तैयारी कर रही है। चन्नी लगातार दोआबा में सक्रिय रहे हैं।कांग्रेसियों को चन्नी से काफी उम्मीद है। वह रविदासिया समाज से हैं और दोआबा रविदासिया समाज का गढ़ माना जाता है। चन्नी लगातार रविदासिया समाज के डेरे सच्चखंड बल्लां में आ रहे हैं और वहां पर 25 करोड़ की राशि भी दी गई है। वहीं भाजपा भी दोआबा में ताकत झोंक रही है। दोआबा से दलित नेता विजय सांपला को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का चेयरमैन बनाया गया। इसके अलावा दोआबा से ही लोकसभा सांसद सोमप्रकाश को केंद्रीय राज्यमंत्री बनाया गया। भाजपा अपना दलित कार्ड खेल रही है। आम आदमी पार्टी की तरफ से भी दोआबा को फोकस कर ताकत झोंकी जा रही है। संयुक्त समाज मोर्चा भी मैदान में आ रहा है। यहां के आलू किसानों ने संयुक्त समाज मोर्चा का हाथ पकड़ लिया है और मैदान में तैयारी शुरू कर दी है। कुल मिलाकर इस बार माझा व दोआबा में दिलचस्प मुकाबला होने के आसार बन गए हैं।

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