जरूर जानें हिन्दू धर्म के 10 सिद्धांतों का रहस्य…

नई दिल्लीः हिंदू धर्म के पवित्र ग्रन्थों को दो भागों में बांटा गया है- श्रुति और स्मृति। श्रुति अर्थात ईश्‍वर से सुने हुए। स्मृति अर्थात सुनकर याद करने के बाद कहे गए। स्मृति ग्रन्थों में देश-कालानुसार बदलाव हो सकता है, लेकिन श्रुति में नहीं। श्रुति के अन्तर्गत चार वेद आते हैं- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। ब्रह्म सूत्र और उपनिषद् वेद का ही हिस्सा हैं। प्रमुख स्मृति ग्रन्थ हैं:- मनु स्मृति, रामायण, महाभारत और 18 पुराण। श्रीमद्भगवद गीता महाभारत का एक हिस्सा है। वेद ही धर्मग्रंथ है दूसरा अन्य कोई नहीं। हमने हिन्दू धर्म के प्रमुख सिंद्धांत और परंपरा को 10 मुख्‍य बिंदुओं में समेटा है।
1.ब्रह्म ही है ‘सत्य’
ब्रह्म ही सत्य है। वह अजन्म, अप्रकट और निर्विकार है। ब्रह्म को ही ईश्वर, परमपिता, परमात्मा, परमेश्वर और प्रणव कहा जाता है। मूलत: ईश्वर एक और केवल एक है। दूसरा कोई नहीं।

2.आत्मा है ‘अजर अमर
ब्रह्मांड में आत्माएं असंख्य और अनंत है। मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़ और पौधों आदि में आत्माएं विद्यमान है। पेड़, पौधों, जल, अग्नि आदि समस्त दिखाई देने वाला जगत ही भीतर से न दिखाई देने वाला आत्मा के द्वारा ही चलायमान है। आत्मा सनातन, अव्यक्त, अजर, अमर, अप्रमेय और निर्विकार है। कर्मों के अनुसार आत्मा जन्म-मरण के चक्र में स्वयं निर्लिप्त रहते हुए अगला शरीर धारण करती है। जन्म-मरण का सांसारिक चक्र तभी खत्म होता है जब व्यक्ति को मोक्ष मिलता है।

3.आत्मा का अंतिम लक्ष्य ‘मोक्ष’
वैदिक सनातन धर्म की महत्वपूर्ण देन में से एक मोक्ष की धारणा है। मोक्ष का अर्थ होता है पूर्ण मुक्ति। आत्मज्ञान या ब्रह्मज्ञान प्रा‍प्त करना ही मोक्ष है। इसे प्राप्त करने के लिए तीन उपाय है:- अभ्यास, ध्यान और जागृति।

4.संध्यावंदन है प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य
संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। मंदिर में जाकर संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि आठ वक्त की मानी गई है। उसमें भी पांच महत्वपूर्ण है। पांच में से भी सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्वपूर्ण है।

5.तीर्थ करना है पुण्य कर्म
तीर्थ और तीर्थयात्रा का बहुत पुण्य है। जो मनमाने तीर्थ और तीर्थ पर जाने के समय हैं उनकी यात्रा का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं। तीर्थों में चार धाम, ज्योतिर्लिंग, अमरनाथ, शक्तिपीठ और सप्तपुरी की यात्रा का ही महत्व है। अयोध्या, मथुरा, काशी और प्रयाग को तीर्थों का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जबकि कैलाश मानसरोवर को सर्वोच्च तीर्थ माना है।
बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी ये चार धाम है। सोमनाथ, द्वारका, महाकालेश्वर, श्रीशैल, भीमाशंकर, ॐकारेश्वर, केदारनाथ विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, रामेश्वरम, घृष्णेश्वर और बैद्यनाथ ये द्वादश ज्योतिर्लिंग है। काशी, मथुरा, अयोध्या, द्वारका, माया, कांची और अवंति उज्जैन ये सप्तपुरी हैं। उपरोक्त कहे गए तीर्थ की यात्रा ही धर्मसम्मत है।

6) ‘सामूहिक उत्सव’ मनाना जरूरी
उत्सव, पर्व और त्योहार सभी का अलग-अलग अर्थ और महत्व है। प्रत्येक ऋतु में एक उत्सव है। उन त्योहार, पर्व या उत्सव को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख वैदिक धर्मग्रंथ, धर्मसूत्र, स्मृति, पुराण और आचार संहिता में मिलता है। चंद्र और सूर्य की संक्रांतियों अनुसार कुछ त्योहार मनाएं जाते हैं। 12 सूर्य संक्रांति होती हैं जिसमें चार प्रमुख है:- मकर, मेष, तुला और कर्क। इन चार में मकर संक्रांति महत्वपूर्ण है। सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ, संक्रांति और कुंभ। पर्वों में रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, गुरुपूर्णिमा, वसंत पंचमी, हनुमान जयंती, नवरात्रि, शिवरात्रि, होली, ओणम, दीपावली, गणेश चतुर्थी और रक्षाबंधन प्रमुख हैं। हालांकि सभी में मकर संक्रांति और कुंभ को सर्वोच्च माना गया है।

7.संस्कार ही है सभ्य समाज का आईना
संस्कारों के प्रमुख प्रकार सोलह बताए गए हैं जिनका पालन करना हर हिंदू का कर्तव्य है। इन संस्कारों के नाम है-गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। प्रत्येक हिन्दू को उक्त संस्कार को अच्छे से नियमपूर्वक करना चाहिए। यह मनुष्य के सभ्य और हिन्दू होने की निशानी है। उक्त संस्कारों को वैदिक नियमों के द्वारा ही संपन्न किया जाना चाहिए।

8.पाठ करना:- वेदों, उपनिषद या गीता का पाठ करना या सुनना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है। उपनिषद और गीता का स्वयंम अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है, लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है। प्रतिदिन धर्म ग्रंथों का कुछ पाठ करने से देव शक्तियों की कृपा मिलती है। हिन्दू धर्म में वेद, उपनिषद और गीता के पाठ करने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है।

9.धर्म प्रचार:- धर्म की प्रशंसा करना और धर्म के बारे में सही जानकारी को लोगों तक पहुंचाना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होता है। धर्म प्रचार में वेद, उपनिषद और गीता के ज्ञान का प्रचार करना ही उत्तम माना गया है। धर्म प्रचारकों के कुछ प्रकार हैं। हिन्दू धर्म को पढ़ना और समझना जरूरी है। हिन्दू धर्म को समझकर ही उसका प्रचार और प्रसार करना जरूरी है। धर्म का सही ज्ञान होगा, तभी उस ज्ञान को दूसरे को बताना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म प्रचारक होना जरूरी है। इसके लिए भगवा वस्त्र धारण करने या संन्यासी होने की जरूरत नहीं। स्वयं के धर्म की तारीफ करना और बुराइयों को नहीं सुनना ही धर्म की सच्ची सेवा है।

10.धर्म-कर्म के कार्य करना जरूरी:- धर्म-कर्म का अर्थ यह कि हम ऐसा कार्य करें जिससे हमारे मन और मस्तिष्क को शांति मिले और हम मोक्ष का द्वार खोल पाएं। साथ ही जिससे हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय हित भी साधे जाते हों। अर्थात ऐसा कार्य जिससे परिवार, समाज, राष्ट्र और स्वयं को लाभ मिले। धर्म-कर्म को कई तरीके से साधा जा सकता है, जैसे- 1.व्रत, 2.सेवा, 3.दान, 4.यज्ञ, 5.प्रायश्चित, दीक्षा देना और मंदिर जाना आदि।

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