Encounter News
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Tuesday, August 11, 2020 Search Search YouTube Menu

आईए आगे बढ़ें

पुराने समय में एक राहगीर अपने घोड़े पर सवार होकर अपने गांव से कहीं शहर की ओर जा रहा था। रास्ते में घोड़े को प्यास लगी। जल के स्रोत के रूप में उसने एक कुआं के देख अपना घोड़ा वहां खड़ा किया। संयोग से कुआं उस समय चल भी रहा था तो उसने घोड़े को पानी पीने के लिए आगे किया परंतु कुएं में अल्हट के चलने से हो रही खटखट की आवाज से डरकर घोड़ा पीछे हट गया। राहगीर ने कुएं वाले से कुएं की खटखट को बंद करने के लिए कहा तो उसने कुएं को रोक दिया। जब तक घोड़ा पानी पीने के लिए फिर से आगे आया तब तक चुबच्चे में पानी खत्म चुका था। उसने फिर से पानी चालू करने के लिए कहा तो कुएं वाला कहने लगा भाई…! पानी चालू करता हूं तो खट-खट की आवाज से तेरा घोड़ा डर जाता है और खट-खट बंद करता हूं तो पानी आना बंद हो जाता है। अब तेरे घोड़े को अगर प्यास बुझानी है तो थोड़ी खट-खट तो सहन करनी पड़ेगी। नहीं तो वह प्यासा ही मरेगा।
अब इस कहानी का यदि विश्लेषण करें तो आज की परिस्थिति में घोड़ा है आज का मनुष्य। पानी है उसकी जीविका और दोनों के बीच में खड़ा है कोरोना, कुंए की खट-खट के रूप में। तो अब अगर घोड़े को पानी पीना है तो खटखट भी सहन करनी होगी। भाव कि हमें अपनी सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों में सुधार लाने के लिए कोरोना के साथ जीना सीखना होगा। मेरे कहने का अर्थ है कि ऐसा रास्ता निकालना होगा जिसमें हम घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर स्वयं को सुरक्षित रखते हुए अपना काम-काज कर सकें। लाकडाऊन-3 का कुछ रियायतों के साथ शुरू होना शायद इसी बात का संकेत है।

गतिशीलता ही जीवन है जीवन की गति सदा के लिए तो रुक नहीं सकती। परिस्थितियां कैसी भी हों, इस मानव को उसके साथ संघर्ष करते हुए जीवन जीने का सामर्थ्य तो दिया ही है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने लिखा है-

वह पथ क्या पथिक कुशलता क्या, जिस पथ में बिखरे शूल न हों..
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या, जब धाराएं प्रतिकूल न हों।


अब आइए, एक चिंतन करें कि हम ‘घर में रहिए, सुरक्षित रहिए, से ‘काम भी करिए और सुरक्षित भी रहिए’ की और कैसे बढऩा है।
स्वच्छता:- यूं तो साफ-सफाई का हमारे जीवन में सदा से ही महत्व रहा है परंतु कोरोना नाम की बीमारी के चलते इसका महत्व और भी बढ़ गया है। प्रशासन द्वारा बार-बार इस बात को प्रचारित कर किया गया है कि समय-समय पर हाथ धोएं, घर एवं कामकाज के प्रतिष्ठानों को साफ रखें। इसलिए अब हमें स्वच्छता को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाना होगा।
दूरी बनाए रखें:- लॉकडाउन तो मात्र एक बचाव का साधन है न कि इलाज। घर में रहते हुए सामाजिक दूरी बनाना सरल हो सकता है पर जब हम कामकाज के लिए बाहर निकलेंगे तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने में निश्चय ही थोड़ी असुविधा होगी। उपाय स्वरूप हमें अपने काम करने की शैली में कुछ बदलाव करना होगा। अपने उद्योगों या कामकाज के प्रतिष्ठानों में वर्कर्स को काम करना और उनकी सफाई या सैनेटाइजेशन विशेष ध्यान रखना होगा। अब एक दूसरे से हाथ मिलाने की बजाय हाथ जोड़कर शिष्टाचार की अभिव्यक्ति करनी होगी।
जागरूकता:- सोशल मीडिया एक ऐसा साधन है जिस पर हमे अपने शहर और देश-दुनिया में होने वाली घटनाओं का पता चल जाता है परंतु इसके द्वारा मिलने वाली जानकारियां झूठी भी सिद्ध होती हैं। इन सभी झूठी खबरों से बचते हुए हमें अपने शहर की स्थिति की जानकारी भी रखनी चाहिए। इसके लिए हमे ‘अरोग्य सेतू एपÓ हमारी काफी सहायता कर सकता है। कोई भी निर्णय लेने से पहले हमें स्थानीय प्रशासन के द्वारा जारी किए गए निर्देशों को ध्यान में रखना चाहिए।
शिक्षा:- किसी भी समाज में शिक्षा का बहुत महत्व है। जीवन में किसी प्रकार की क्षति की पूर्ति हो सकती है परंतु शिक्षा के क्षेत्र में हमने अपने बच्चों को समय रहते ध्यान नहीं दिया तो आने वाले कई वर्षों तक उसके नुकसान का भुगतान करना कर पाना कठिन होगा। शायद इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमारे शिक्षकों ने समय रहते ही बच्चों के साथ घर बैठे ही ऑनलाइन एजुकेशन के माध्यम से संपर्क बनाया। यद्यपि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यह प्रक्रिया देश-विदेश में पहले से ही प्रचलन में है। पर प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी चुनौती थी। वर्णनीय है कि किसी भी अध्यापक के लिए ऑनलाइन एजुकेशन के माध्यम से पढ़ाना इतना सरल नहीं है।
थोड़े दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने यह कहा भी कि ‘प्रोवेडिंग ई-एजुकेशन इज नाट ए चिल्ड्रनस प्ले’। वहां पर मेरा बच्चों के माता-पिता से विशेष आग्रह है कि अध्यापकों द्वारा किए गए इस प्रयास में उनका सहयोग करें। उनके प्रति सम्मान का भाव रखें और बच्चों बच्चों के मन में इस ढंग से पडऩे के लिए रूचि विकसित करें। सामाजिक दूरी को बनाए रखने हेतु बच्चों को शिक्षा में शिक्षा के विकास के लिए इस माध्यम का बहुत महत्व है।
सुरक्षित रहिए, भयभीत नहीं:- सुरक्षा व्यक्ति बाहर से करता है पर भय तो उसके मन में होता है और इसलिए हमें भीतर से इस भय को समाप्त करना होगा। इसके लिए अपने मनोबल को बढ़ाइए। ऐसा नहीं है कि आज जो परिस्थिति बनी है वो सदा ऐसी ही रहेगी। वैसे भी जब परिस्थितियां अनुकूल हों तो कोई भी प्रसन्न रह सकता है पर मानसिक रूप से हम कितने स्वस्थ हैं इसका पता तो तब ही चलता है जब परिस्थितियां प्रतिकूल हों। इसलिए चिंता कम करें’ और सावधान ज्यादा रहें।
भरोसा:- जीवन में ईश्वर पर भरोसा जरूर रखें। भरोसा रखने वाला कभी घबराता नहीं। वो जीवन की हर परिस्थिति के साथ सामंजस्य बिठाने का प्रयास करता है और एक समय आता है परिस्थितियां स्वयं ही अनुकूल होने लगती हैं। समय फिर बदलेगा, बस विश्वास रखेंं।
ईश्वर कृपा करें। लाकडाउन-4 देखने को ना मिले, और फिर भी अगर ऐसी स्थिति बनती है तो उसके लिए भी हमें तैयार रहना है। आखिर जीवन में हमें आगे तो बढना ही है। क्योंकि घोड़े को पानी पीना है तो थोड़ी खट-खट सहन करनी ही होगी। जब तक इस बीमारी का कोई इलाज या वैक्सीन नहीं मिल जाती तब तक इंतजार करना है इस कोरोना की बीमारे के साथ ही जीना सीखना है। आशा है कि शीघ्र ही हमारी गतिविधियां सामान्य हो जाएंगी और हम अपने आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में आगे बढ़ पाएंगे।

महामंडलेश्वर स्वामी शांतानंद उदासीन जालंधर।