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Monday, November 30, 2020 Search Search YouTube Menu

30 साल की उम्र के बाद मां बनना खतरनाक !

प्रेग्नेंसी में हो सकती हैं कई समस्याएं

नई दिल्लीः बहुत सी महिलाएं देर से शादी करती हैं और फिर फैमिली शुरू करने से पहले भी 4-5 साल का इंतजार करती हैं। ये सब करते-करते जाहिर सी बात है कि उम्र 30 के पार हो जाती है। इसका कारण शायद यह है कि इन दिनों महिलाएं भी अपने करियर को उतनी ही अहमियत दे रही हैं जितनी पुरुष देते हैं। एक तरह से देखा जाए तो 30 से 40 की उम्र को फैमिली स्टार्ट के लिए आप अच्छा भी मान सकती हैं क्योंकि इस समय आप मच्योर हैं। फाइनैनशियली सेटल हैं और परिवार की जिम्मेदारियां उठाने के लिए पूरी तरह से तैयार भीं। लेकिन 30 की उम्र के बाद मां बनने पर प्रेग्नेंसी और चाइल्ड बर्थ के दौरान कई तरह के कॉम्प्लिकेशन्स हो सकते हैं। इनमें से कुछ मामूली मुश्किलें तो कुछ बड़ी जटिलताएं भी हो सकती हैं। 30 की उम्र के बाद प्रेग्नेंट होना नामुमकिन नहीं है लेकिन 20 से 30 की उम्र में प्रेग्नेंट होने वाली महिलाओं की तुलना में 30 की उम्र के बाद प्रेग्नेंट होने वाली महिलाओं को कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इस दौरान आपको घबराने या पैनिक होने की जरूरत नहीं है। बस पहले से खुद को तैयार रखने की जरूरत है ताकि आपकी प्रेग्नेंसी पूरी तरह से स्मूथ रहे और आपको किसी तरह का कॉम्प्लिकेशन ना हो। प्रेग्नेंसी के 37वें हफ्ते से पहले अगर किसी बच्चे का जन्म होता है तो उसे प्रीमच्योर डिलिवरी या प्री-टर्म लेबर की कैटिगरी में रखा जाता है। ये एक गंभीर जटिलता है क्योंकि बच्चे का अगर समय से पहले जन्म हो जाए तो उसे सेहत से जुड़ी मुश्किलें हो सकती हैं क्योंकि गर्भ में रहने के दौरान उसका जितना और जिस तरह से विकास होता है, वह समय से पहले डिलिवरी होने की वजह से नहीं हो पाएगा। लिहाजा आपको अपने शरीर में दिखने वाले कुछ संकेतों पर समय रहते ध्यान देना चाहिए ताकि प्री-टर्म लेबर के खतरे को रोका जा सके। अगर ड्यू डेट से पहले ही ये लक्षण जैसे- क्रैम्प्स, फ्लूइड डिस्चार्ज, वजाइना से ब्लड का फ्लो, पीठ में दर्द आदि नजर आए तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। 30 से 40 साल के बीच प्रेग्नेंट होने वाली महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज यानी प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है और करीब 5 प्रतिशत मामलों में इसका खतरा रहता है। अगर किसी महिला को डायबिटीज नहीं भी है तब भी प्रेग्नेंसी के दौरान उनका ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है। ऐसे में अगर आपको प्रेग्नेंसी के दौरान बार-बार बहुत ज्यादा प्यास या भूख लगे, या बार-बार यूरिन पास करने के लिए टॉइलट जाना पड़े तो आपको अपना शुगर टेस्ट करवाना चाहिए। अगर प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज के खतरे का पता न चले तो होने वाले बच्चे का जन्म समय से पहले हो सकता है, जन्म के वक्त बच्चे का वजन अधिक हो सकता है या फिर होने वाले बच्चे को टाइप 2 डायबीटीज होने का भी खतरा रहता है। प्रेग्नेंसी के दौरान अगर हाई ब्लड प्रेशर की दिक्कत हो जाए तो यह गंभीर खतरा हो सकता है और इससे शरीर के बाकी अंगों को भी नुकसान का खतरा रहता है और इस परिस्थिति को ही प्रीक्लैम्प्सिया कहते हैं। अगर आपको शरीर में ये लक्षण दिखें जैसे- हाथ और पैर में ज्यादा सूजन, वॉटर रिटेंशन, जी मिचलाना और सिरदर्द, देखने में परेशानी, सांस लेने में दिक्कत आदि तो इन्हें गंभीरता से लें और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। 30 से 40 की उम्र में प्रेग्नेंट होने पर प्रीक्लैम्प्सिया का रिस्क बढ़ जाता है जिससे होने वाली मां के साथ-साथ बच्चे को भी कई तरह का खतरा हो सकता है। अगर जन्म के वक्त बच्चे का वजन 2.5 किलोग्राम से कम है तो उस बच्चे को लो-बर्थ वेट बेबी यानी कम वजन वाला बच्चा माना जाता है। आमतौर पर जिन बच्चों का जन्म समय से पहले हो जाता है उनमें यह दिक्कत ज्यादा देखने को मिलती है। 30 की उम्र के बाद प्रेग्नेंट होने पर होने वाले बच्चे में यह दिक्कत हो सकती है। लिहाजा अपनी गाइनैकॉलजिस्ट से बात करें और वह जैसा सुझाव दें उसके अनुसार ही काम करें। अगर 35 साल की उम्र के बाद कोई महिला प्रेग्नेंट होती है तो उनमें एक्टोपिक यानी अस्थानिक प्रेग्नेंसी होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इस समस्या में फर्टिलाइज्ड एग, यूट्रस यानी गर्भाशय के अंदर नहीं बल्कि बाहर अटैच हो जाता है और इस वजह से वह भ्रूण पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता और आखिरकार मिसकैरेज का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में अगर प्रेग्नेंसी के शुरुआती दिनों में आपको हद से ज्यादा कमजोरी, चक्कर आना, सिर घूमना, शरीर के एक तरफ तेज दर्द महसूस हो और थोड़ा बहुत वजाइनल ब्लीडिंग नजर आए तो इन लक्षणों को नजरअंदाज करने की बजाए एक बार अपना चेकअप जरूर करवा लें।

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